संप्रदाय क्या होता है?
हमारे देश में सम्प्रदायों का बड़ा बोलबाला है। हर आदमी दूसरे से पूछता है कि आप किस सम्प्रदाय के हैं? चार सम्प्रदाय चल रही हैं हमारे भारत में। एक सम्प्रदाय ब्रह्मा से मानते हैं, दूसरे शंकर से मानते हैं, तीसरे लक्ष्मी से मानते हैं, चौथे सनकादिक परमहंसों से मानते हैं। ये चार सम्प्रदाय चल रही हैं। और भी हैं और रोज बनती जा रही हैं। बेचारा एक भगवान्, उसको पाने के लिए ये लड़ाई है। अगर किसी महापुरुष से कोई सम्प्रदाय मानी जाए, तो लाखों महापुरुष हो चुके, फिर लाखों संप्रदाय होंगे; जैसे- रामानुज सम्प्रदाय है आजकल, शंकराचार्य की सम्प्रदाय है आजकल। तो सबसे पहले शंकराचार्य को लो।
ये सबसे पुराने हैं। यानी ढाई हजार वर्ष पहले हुए हैं शंकराचार्य। उसके बाद फिर हुए हैं रामानुजचार्य, माधवाचार्य निम्बार्काचार्य। तो शंकराचार्य से सम्प्रदाय मानने वाले जरा जवाब दें कि शंकराचार्य के गुरु कौन थे? गोविन्दाचार्य। उनसे क्यों नहीं कहते कि हम गोविंददाचार्य सम्प्रदाय के हैं? गोविंददाचार्य के गुरु? गौड़पादाचार्य। तो ये क्यों नहीं कहते हैं कि गौड़पदचार्य के सम्प्रदाय के हम हैं? गौड़पदचार्य के गुरु? शुकदेव परमहंस। ये क्यों नहीं कहते हैं कि शुकदेव परमहंस के सम्प्रदाय के हम हैं? शुकदेव परमहंस के गुरु? वेदव्यास। ये क्यों नहीं कहते हैं कि हम वेदव्यास सम्प्रदाय के हैं? और अगर शंकराचार्य के सम्प्रदाय के कहते हैं तो शंकराचार्य के चेले कहेंगे कि हमारी सम्प्रदाय भी बोलो। फिर तो सभी महात्माओं की सम्प्रदाय हो जाएगी। तुलसीदास की सम्प्रदाय, सुरदास की सम्प्रदाय, मीरा की सम्प्रदाय सबकी सम्प्रदाय हो जाएगी। ये नासमझी की बातें हैं।
अरे भई! तीन ही तत्त्व तो हैं। अगर आप लोगों से कोई सम्प्रदाय के बारे में पूछे तो सीधा -सीधा जबाब देना कि ये बताइये कि जीव के सिवा कौन बचा? एक तो जीव है यानी हम सब मायाधीन, नम्बर दो भगवान् है, नम्बर तीन माया है। चौथा तो कोई तत्त्व है नहीं । कहीं लिखा है चौथा तत्त्व? तो हमारे सिवा दो बचे एक भगवान्, एक माया। तो हम सब जीव इन्हीं दोंनो मे किसी के फालैअर होंगे। या तो हम भगवान् की पार्टी के होंगे या तो माया की पार्टी के होंगे। तीसरी कोई चीज है ही नहीं है जिसकी पार्टी बने। तीसरे तो हम लोग हैं ही बनने वाले। तो जो भगवान् को अपना इष्ट मानते हैं, और भगवान् में आनन्द मानतेे हैं और भगवान् की भक्ति करते हैं, वो भागवत सम्प्रदाय के हो गये और जो संसार में सुख मानते हैं और संसार को ही अपना सर्वस्व मानते हैं वो माया सम्प्रदाय के हो गये । बस छुट्टी। अब अगर भगवान् में भी आप ये कहें कि कौन-से भगवान् के हैं? तो अनन्त भगवान् हो चुके हैं, अनन्त अवतार। *'अवतारा ह्यसंख्येया'* भागवत कह रही है। भगवान् के अनन्त अवतार हो चुके हैं। तो एक-एक अवतार की सम्प्रदाय बन जाएगी। है तो सब भगवान ही वो। तो इसलिए बस दो सम्प्रदाय हैं- एक भगवान् की, एक माया की।
वाजश्रवा नाम के मुनि से थे, गौतम कुल में। ये वेद की बात बता रहा हूँ, अनादि वेद की। वाजश्रवा के पुत्र का नाम था अरुण, अरुण के पुत्र का नाम था उद्दालक, उद्दालक के पुत्र का नाम नचिकेता । तो वेद में नचिकेता और यमराज का संवाद लिखा है। तो उसमें पहले तो यमराज ने बड़ी मीठी-मीठी बातें बताई नचिकेता को, लालच दिया-
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति
(कठोप. १-११-१२)
स्वर्ग में कोई भय नहीं है। यमराज ने कहा। बड़ा सुख है। नचिकेता ने कहा मुझे मालूम है क्या है स्वर्ग में, मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए। तो जब देख लिया यमराज ने कि नाचिकेता बड़ा विरक्त और ज्ञानी है, ये हमारे चक्कर में नहीं आयेगा तो उन्होंने कहा अच्छा बेटा सुनो-
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभेे नानार्थे पुरूष सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधुभवति हीयतेSर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते।।
(कठोप. १-२-१)
देखिये कितना बढ़िया निरूपण है वेद में। बेटा! देखो दो तत्त्व हैं जीव के अतिरिक्त, एक भगवान् एक माया। तो इन दोनों का जो रास्ता जाता है तो एक रास्ते का नाम श्रेय, एक रास्ते का नाम प्रेय। तो जो श्रेय के मार्ग से जाता है वो आनन्द पा लेता है, दुःख समाप्त हो जाता है उसका और जो प्रेय के मार्ग से जाता है वह दुःख ही दुःख पाता है, अनन्तकाल तक चौरासी लाख में घूमता है। ये वेदमंत्र का अर्थ।
तो बस दो सम्प्रदाय हुई। या तो श्रेय की ओर कोई चले या प्रेय की ओर चले। या तो भगवान् की ओर चले गए या तो संसार में सुख मान ले, उधर भागे। तीसरा कोई एरिया नहीं है जहाँ कोई भागेगा। तो इस प्रकार बस दो ही सम्प्रदाय हैं। एक भगवान् के मानने वाले और एक माया में सुख मानने वाले। अब माया में तीन गुण है- सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। तो सत्त्वगुण का जो
लक्ष्य है वो स्वर्ग है, रजोगुण का मृत्युलोक है, तमोगुण का नरक है। इसमें भी अपना-अपना लक्ष्य है। कोई स्वर्ग जाने का प्रयत्न (साधना) करता है, कोई मृत्युलोक के लिए करता है, कोई नरक के लिए करता है। अरे कहता नहीं है कि हम नरक के लिए कर रहे हैं लेकिन चोरी, डकैती, मर्डर, शराब, कबाब में जो लगा है वो नरक जाएगा ही। वो भले ही मुंह से बोले मुझे नरक नहीं चाहिए। अरे! नहीं चाहिए तो ये सब क्यों करते हो? चाहिए से मतलब नहीं है। हम नहीं चाहते कि हमारे शरीर में कहीं दर्द हो लेकिन हम कुल्हाड़ी से मारेंगे पैर में। अरे! दर्द होगा ही फिर तो। तुम जो कुछ कर रहे हो, उसका फल तो भोगना पड़ेगा। तो इसलिए बस दो ही सम्प्रदाय हैं और बाकी सब झगड़ा तो हम लोगों का बनाया हुआ है और लड़ने का है।
वो बहुत साल पहले, तीन-चार सौ साल पहले, तुलसीदास के थोड़ा- सा पहले हमारे देश में शैव और वैष्णव में बाकायदा युद्ध हुआ, मर्डर हूए सैकड़ों। शैव जो हैं, शिव को मानने वाले, वो विष्णु की बुराई करें; विष्णु को मानने वाले शंकर जी की बुराई करें और मारधाड़ हो गई। ये लो। ये सम्प्रदाय का नाटक है। जैसे हमारे देश में सब भारत देश के भक्त हैं, सब बोलते हैं - 'भारत माता की जय।' ये कम्यूनिस्ट है, काँग्रेस है, ये भाजपा है, ये माकपा है, खोपड़ा जपा है। तमाम् सारे हैं न हमारे देश में और सब कहते हैं कि हम देश का कल्याण करेंगे। और एक दूसरे को गाली गलौज, मारधाड़ सब करते रहते हैं। तो ऐसे ही ये सम्प्रदाय की लड़ाई स्प्रिचुअल जगत् में भी हो रही है। भगवान् तो सम्प्रदायों से परे हैं। वो मतमतान्तर से, बुद्धि से, तर्क से, इन सब के चक्कर में नहीं रहता। वो तो भोले बालक के भोलेपन वाले सरल स्वभाव वालों से प्यार करता है। वो इन लोगों से नहीं करता है संप्रदाय वालों से।
इसलिए अगर कोई कहे तो कभी लड़ना झगड़ना नहीं। बड़े प्यार से कह देना देखो भईया मैं तो ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं हूँ। ये सुना है कि एक भगवान् है, एक माया है। तो जो भगवान् का भक्त है वो भगवान् के सम्प्रदाय वाला है, जो माया का भक्त है वो माया के सम्प्रदाय वाला है। तो मैं भगवान् का भक्त बनना चाहता हूँ, तो मैं उसी सम्प्रदाय का हूँ, छुट्टी। हाँ।
जगद्गुरुतम श्री कृपालु जी महाराज
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February 18, 2023
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