अहंकार(ego) कैसे समाप्त हो ?
दीनता की मात्रा कितनी है। मात्रा का भेद है। एक व्यक्ति में सेंट परसेंट है, एक में फिफ्टी पर्सेन्ट है, एक में ट्वेन्टी पर्सेन्ट है ये मात्रा का अन्तर होता है। तो जब तक पूर्ण सेंट पर्सेन्ट न हो तब तक अहंकार बना रहता है, चोरी चोरी। दीनता और अहंकार दोनों विरोधी चीज हैं। अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है और ये सबके भीतर रहता है छूपा हुआ । वैसे अहंकार की कोई बात नहीं है किसी के पास। जैसे मान लो धन का अंहकार। धन में तो अथॉरिटी है कुबेर। दुनियाँ में कोई धनी ऐसा नहीं है जो एक शहर भी खरीद सके। खाली दिल्ली को खरीदने वाला दुनियाँ में कोई धनी नहीं है ऐसा। तो फिर धन का मद क्यों करे ? क्या है उसका धन।
एक राजा डायोजिनीज फकीर के पास पहुंचा और कहा कि हम को कुछ सेवा बताइये। तो उन्होंने कहा, 'तुम क्या करते हो?' हम इतने बड़े राजा हैं और ये हैं वो हैं। तो उन्होंने कहा कि दुनियाँ का नक्शा लाओ। दुनियाँ का नक्शा मँगाया और उसने कहा कि तुम्हारा देश कहाँ पर है इसमें? उसने कहा यहाँ पर है मिस्र। उन्होंने कहा उसमें तुम्हारा कितना अधिकार कितना है? उन्होंने कहा कि इतना। तो उन्होंने कहा- "इतनी बड़ी दुनियाँ में इतना जो अधिकार बता रहे हो ये एक बिंदी के बराबर भी नहीं है। तो तुम क्या मद कर रहे हो कि हम यहाँ के राजा हैं, वहाँ के राजा हैं, ये है वो हैं। तुम सेवा नहीं कर सकते। सेवा करने में अहंकार छोड़ना पड़ता है। और तुम राजा हो, अहंकार छोड़ नहीं सकते। अगर तुम सिर भी झुकाओगे भगवान् को, महात्मा को, तो ये सोचते हुए कि देखो मैं राजा होकर के सिर झुका रहा हूँ। तो वहाँ भी अहंकार छूपा रहेगा।"
तो मात्रा का भेद होता है। दीनता तो उसे कहते हैं कि शक्ति होते हुए शक्ति का अंहकार न होना। जैसे रावण था। स्वर्ग तक उसका अधिकार था, यमराज उसका सर्वेंट था, अब वो अहंकार करे तो वाजिब है। ठीक है भई! जिसके यहाँ इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज सब नौकर हों, वो तो भगवान् के बराबर हो गया हैं करीब करीब, वो अहंकार करे तो ठीक है। लेकिन संसार के लोग जो अंहकार करते हैं, क्या है उनके पास? ये कलेक्टर है, कमिश्नर है, गवर्नर है, करोड़पति हैं, अरबपति है, बस। अरे क्या हैसियत है? शरीर गन्दा, मन गन्दा, बुद्धि गन्दी और जो कुछ उनके पास है भी उसको भी वो जानते हैं कि ये मेरा नहीं रहेगा; क्योंकि जब शरीर ही नहीं रहेगा तो ये सब कैसे रहेंगे तेरा। चाहे हजार कोठी बनवाओ। भगवान् कहते हैं- भई! जमीन तो मेरी है। तुम कोठी बनवाओ अच्छा है सजा दो। इसके बाद तुम बैरंग जाओगे। शरीर भी जो हमने दिया वह भी रखवा लेगें।
तो अहंकार का कोई कारण नहीं है किसी में अगर कोई जरा सोचे गंभीरता पूर्वक। लेकिन अहंकार नीचे वाले को देख कर होता है। आम तौर से ये सिद्धान्त है। अपने से नीचे वाले को देखा कम सुन्दर है, कम धनी है, कम विद्वान् है, कम प्रॉपर्टी वाला है तो अहंकार होता है। अब जब अपने से आगे वाले को देखता है तो वह नम्रता, दीनता आती है।
तो भगवान् के आगे दीन बनने में तो कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए क्योंकि उससे बड़ा और कोई तो है ही नहीं और फिर हमको गरज है। संसार में जब किसी को गरज होती है तो वो घोर नीच के आगे भी दीन बन जाता है। चार दिन का भूखा हो तो वह कैसे खाना माँगता है? कैसे पानी माँगता है? संसार में सब दीन बन जाते हैं समय -समय पर। कोई चीज़ की आवश्यकता है आपको और आपके पास नहीं है, दूसरे के पास है और बिना उस चीज़ के आपका काम चलेगा नहीं तो आप दीन बन जाते हैं उसके आगे; हमें पानी पिला दो, हमें खाना खिला दो। जब पैदा हुए तब से लेकर हम भूखे हुए तो रोये। नहीं जानते थे कि बाप क्या होता है, माँ क्या होती है? लेकिन दीन बन गए, रोये। ये रोना ही दीनता का स्वरूप है। कोई शक्ति नहीं हमारे पास और भूख लगी है। शब्द भी नहीं बोल सकता बच्चा वो। इशारा भी नहीं कर सकता पेट की ओर, बस रो दिया। अब माँ अगर समझ सकी ठीक-ठीक तो ठीक है दूध पिला दिया और नहीं तो पेट में दर्द है, ऊपर से और दूध पिला। बिचारा और बीमार हो गया। सर्वज्ञ तो है नहीं माँ।
तो दीनता तो स्वभावत: सबमें होनी चाहिए। लेकिन ना समझी के कारण, अज्ञान के कारण अपनी प्रशंसा सुनने का जो शौक है, आदत है, प्रैक्टिस है, जब से पैदा हुआ तब से। इसके कारण उसको निन्दा आदि में दुःख होता है। फीलिंग होती है। शब्द में। शब्द। किसी ने किसी को झापड़ लगा दिया ये तो प्रैक्टिकल है। ऐसा नहीं है। खाली शब्द बोल दिया कि तुम मूर्ख हो, तुम गधे हो, तुम निर्लज्ज हो, तुम कामी हो, तुम लोभी हो। ये लो ये शब्द ही तो हैं क ख ग घ और क्या है इसमें। लेकिन उसको इतना फीलिंग हो जाती है। कितनी तो आत्महत्याएं हो जाती हैं, इतने के ऊपर तो। हमको ऐसा कह दिया। अरे! कह ही तो दिया, तुम जो हो वही तो हो।
तुम्हारी कोई चीज छीन तो लिया नहीं उसनें। अगर तुम लोभी नहीं हो और उसने कह दिया कि तुम लोभी हो, तुम्हारा क्या बिगड़ गया? और अगर तुम लोभी हो और उसने कह दिया लोभी, तो ठीक ही कहा। बिल्कुल नुकसान नहीं हुआ तुम्हारा। तो फील क्यों करते हो?
फील करने की जो आदत है वो दीनता के न होने के कारण। अगर तत्त्वज्ञान सदा साथ रहे कि जब तक कोई जीव माया के अण्डर में है तब तक उसमें सारे दोष रहेंगे। बस एक फिलॉसफी याद कर ले। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या, द्वेष, पाखण्ड ये जितने भी दोष हैं माया के ये सबके अंदर सदा रहेंगें। जब तक माया के अण्डर में है। और जब तक भगवत्प्राप्ति न होगी, माया के अण्डर में रहेगा।
तो हर एक आदमी सोच ले कि हमको भगवत्प्राप्ति तो हुई नहीं तो ये सारे दोष हमारे अंदर हैं और रहेंगें। अब इनको हम जितना बचा सके साधना के द्वारा वह बात अलग है। लेकिन इनकी जड़ नहीं समाप्त होगी। जड़ तो रहेगी। अब इस समय देखिए आप सब लोग बैठे हैं हमारी बात सुन रहे हैं। न कोई कामी है, न क्रोधी है, न लोभी है, न मोही है कुछ नहीं है। सब हमारी बात में अपना मन लगाये हैं, सुन रहे हैं। लेकिन हम कमरे के अंदर गए, जरा-सा धक्का दिया किसी ने किसी को। हूँSS....। लेकिन हमारा पाइन्ट ये है कि तत्वज्ञान को सदा साथ रखो तो गड़बड़ी जब आये तो तुरन्त होशियार हो जाओ।
एक ब्राह्मण बहुत गरीब था। उसकी लड़की की शादी की समस्या आई तो क्या करे बेचारा। तो उसने कहा चोरी करेंगे। अब कन्या की शादी तो करना है। तो किसके यहाँ चोरी करें? राजा साहब के यहाँ चोरी करेंगे। राजा भोज के यहाँ। वहाँ तो तमाम मालटाल है। तो किसी प्रकार वो वेश बदल करके घुस गया अंदर रात में, और जिस सामान में हाथ लगावे, सब सोने की चांदी के सामान राजाओं के यहाँ, तो उस समय उसको शास्त्र याद आ जायें। विद्वान था। ये चुरायेंगे, सोना है, तो ये पाप लगेगा। सोने की चोरी महापाप है। पाप नहीं महापाप। महापाप पाँच होते हैं उसके अंदर हैं। उसका फल नरक है। ये चुरायेंगे तो ये दण्ड मिलेगा। ये चुरायेंगे तो शास्त्र ये कहता है। तो रात भर वही कि बस चोरी करना जरूरी है लेकिन करेंगे तो ये दण्ड मिलेगा। इस चक्कर में वह सारी रात वहीं पड़ा रह गया, बाहर नहीं निकल सका। सबेरे राजा साहब को जगाने के लिए जो कायदा था- ब्राह्मण लोग वेद मंत्र बोल रहे हैं, स्त्रियाँ गा रही हैं और हाथी चिंघाड़ रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं और चारों तरफ जय घोष हो रहा हैं राजा साहब का। जगाने के लिए सब नियम थे, वो होने लगे। तो राजा जाग गया। उसी के पलंग के नीचे वो छिपा हुआ था ब्राह्मण कि राजा साहब बाहर निकले तो कोई हिसाब बैठे तो हम भी बाहर जायें। ऐसे निकलेंगे तो पता नहीं क्या दण्ड मिले। तो राजा साहब पलंग पर लेटे-लेटे बड़े अहंकार में बोले, "वाह! कौन है मेरे समान। ये देखो हाथी चिंघाड़ रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं, स्त्रियाँ सब गा रही हैं और पंडित लोग वेद पाठ कर रहे हैं और चारों ओर मेरी जयघोष हो रही है, सब मेरे अण्डर में हैं। ’’ ये बोला तीन लाइन में-
श्लोक
तो ब्राह्मण विद्वान् नीचे बैठा था पलंग के, उससे न रहा गया उसने चौथी लाइन बोल दिया -
संमीलने नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति।
(सूक्ति)
राजा साहब! आँख बंद हो जाएगी तो ये सब कुछ नहीं रहेगा। जो कुछ tum तारीफ कर रहे हो अपनी येे सब कुछ नहीं रहेगा राजा साहब। ये कहां से आवाज आई! ये कौन है? एलार्म किया नौकर भागे आये। उसने कहा, देखो भई! ये कौन है हमारे कमरे के अंदर। लोगों ने देखा तो पंडित जी प्रकट हो गए। उसने कहा तुम! तुम्हारी इतनी हिम्मत कि हमारे कमरे में आ गये? तो उसने बता दिया कि "राजा साहब! ठीक है, आप फाँसी दे दीजिये और क्या करेंगे आप इससे अधिक लेकिन हम इसलिए आये थे। रात भर हम सामान पर हाथ लगाते जरूर थे लेकिन हमें शास्त्र वेद याद आ जायें और हम उसको छोड़ दें। तो कोई चोरी नहीं कर सके।"
राजा को बड़ी फीलिंग हुई कि ये बात तो बिल्कुल ठीक कह रहा है कि मरने के बाद ये सब कुछ नहीं रहेगा। और मरना तो है ही है। अरे! आज नहीं तो कल। जब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, योगी, महात्मा नहीं रहे संसार में तो राजा क्या रहेगा? और ये बिचारा गरीब ब्राह्मण लड़की की शादी के लिए चोरी करने आया था। तो चरणों में गिर गया राजा। उन्होंने कहा तुम पूरा राज्य ले लो। अब मुझे राज्य नहीं चाहिए अब मैं जंगल में जाकर भजन करूँगा। पंडित जी ने कहा- राजा साहब! आप ये क्या कह रहे हैं? मुझे राज्य वाज्य नहीं चाहिए। मुझे थोड़ा सा सोना चाहिए लड़की की शादी करना है। कहें नहीं-नहीं मैं अब नहीं रहता। मेरा अहंकार अब तक मुझको बर्बाद किये था।
तो तत्त्वज्ञान, गुरु ज्ञान, शास्त्र ज्ञान, वेद ज्ञान जो कुछ मिला है उसको लोग भूल जाते हैं। संसार के एटमॉस्फियर में गये कि सब भूल-भाल गये। गलती कर जाते हैं। और गलती करने के बाद फिर अकेले में जब बैठते हैं, अरे! मैंने ये बेबकूफी की। सोचते हैं। तत्त्वज्ञानियों को तत्त्वज्ञान याद आता है, फिर वो सोचते हैं कि अरे! मैंने बाप को डाँट दिया। ये बेवकूफी की मैंने। लेकिन उस समय कर गये।
तो हर आदमी सोचे कि हम में सब दोष हैं। कोई बिना दोष के नहीं है।किसी का प्रकट है किसी का गुप्त है कोई मन ही मन में पाप कर रहा है, कोई बाहर भी करता है। इतना ही फर्क है। और भगवान् मन ही का नोट करता है। तो कौन बचेगा?
जगद्गुरुतम श्री कृपालु जी महाराज
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February 18, 2023
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