भगवान् ने ये दुःखमय संसार क्यों बनाया ?

  
भगवान् की परिभाषा पूछा भृगु ने अपने पिता ब्रह्मज्ञानी वरुण से -

भृगुर्वैः वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्म।
                      (तैत्तिरीयो. ३-१)

पिताजी ! ब्रह्म क्या होता है ? भगवान् किसे कहते हैं ? क्या परिभाषा है ? तो उन्होंने कहा-

यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति ।
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजिज्ञासस्व। तद् ब्रह्म।
                       (तैत्तिरीय. ३-१)

जिससे संसार पैदा हो , जिससे संसार की रक्षा हो , जिसमें संसार का लय हो उसका नाम ब्रह्म, भगवान्, परमात्मा।

"पिताजी! किससे ये संसार पैदा होता है? मैं उसका परिचय जानना चाहता हूँ।" तो उन्होंने कहा- "बेटा ! ये तो साधना करना पड़ेगा। ऐसे ही मेरे बोलने से तुमको बोध नहीं होगा। "गये, साधना किया, लौट कर आये। पिताजी! हम समझ गये। क्या समझ गये?

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्। अन्नाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति। अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
                     (तैत्तिरीयो. ३-२ )

अन्न- ये गेहूँ , चावल , आटा , दाल जो आप लोग खाते हैं. ये ब्रह्म है। इसी से शरीर बनता है। फिर एक शरीर से दूसरा शरीर पैदा होता है। तो वरुण हँसे, उन्होंने कहा, नहीं बेटा! तुम नहीं समझे जाओ फिर साधना करो। फिर गये। लौट कर आये। उन्होंने कहा पिताजी अब समझ गये । क्या समझ गये ?

प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्। प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
                      (तैत्तिरीयो. ३-३)

प्राण ब्रह्मा है। वायु। हम लोग साँस लेते हैं न। नहीं समझे। फिर जाओ।

मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । ( तैत्तिरीयो . ३-४ )

मन , ये ब्रह्म है । नहीं समझे फिर जाओ ।

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्। विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति।
                      (तैत्तिरीयो. ३-६)

आत्मा ब्रह्म है। आत्मा। ये जीव, ' मैं '। नहीं समझे अभी। जीव ब्रह्म नहीं हुआ करता। ये तो ब्रह्म का अंश है, शक्ति है। फिर गये साधना किया। अब की लौट कर आये तो उन्होंने कहा अब समझ में आ गया।

आनंदो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनंदोद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनंदेन जातानि जीवन्ति। आनंदं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।
                      (तैत्तिरीयो. ३-६)

आनन्द ब्रह्म है। हाँ बेटा! अब समझे। आनन्द। आप लोगों ने भगवान् का एक नाम सुना होगा सच्चिदानन्द। सत् चित् आनन्द। तो चाहे सच्चिदानन्द कहो और चाहे चिदानन्द कहो। सत् को छोड़ दो। सत् का लय चित् में होता है और सत् चित् का लय आनन्द में होता है। तो चाहे केवल आनन्द कह दो, तो उसका मतलब सत् चित् उसमें है। 

तो भगवान् का एक नाम है- आनन्द। और चित् माने ज्ञान स्वरूप, सत् माने नित्य ये तीन बाते हैं भगवान् में। नित्य है भगवान् , सर्वज्ञ है भगवान् और आनन्द स्वरूप है। आनन्द रूप है। उसमें आनन्द है ऐसा नहीं। वो आनन्द है। अनलिमिटेड आनन्द।

यो वै भूमा तत्सुखम्। ( छन्दों. ७-२३-१)

हाँ जी, तो जब भगवान् नित्य है, ज्ञानयुक्त है और आनन्द है तो उससे पैदा हुआ ये संसार इसका उल्टा क्यों है? उल्टा माने नश्वर। वो नित्य, नित्य का उल्टा अनित्य नश्वर। वो ज्ञान स्वरूप ये अज्ञान स्वरूप, वो आनन्द स्वरूप यहाँ दुःख ही दु:ख। कहीं आनन्द नहीं। किसी पदार्थ में आनन्द नहीं। न चेतन में, न जड़ में। इस मृत्युलोक में तो क्या आनन्द होगा  स्वर्गलोक में भी नहीं।

आब्रह्मभुवनाल्लोकाः।
                      (गीता ८-१६)

तो भगवान् आनन्द है तो उससे ये दुःख कैसे पैदा हुआ? भगवान् चित् स्वरूप है और ये अचित् जड़ संसार कैसे पैदा हुआ? भगवान् नित्य है तो ये अनित्य संसार कैसे पैदा हुआ? ये प्रश्न है ।
बार - बार कहा शास्त्रों वेदों ने कि भगवान् आनन्द रूप है।

आनन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः।
                        (भाग. ३-९-३ )
आनन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम्॥
                     (भाग. १०-४८-७)

और वेद भी कहता है ।

रसो वै सः। (तैत्तिरीयो.२-७ )

श्लोक (छन्दों. १-१-३)

वो आनन्द स्वरूप है। हाँ हाँ ठीक है, आपको आश्चर्य है। हाँ, हमारे संसार में ऐसा नहीं होता। हाथी से घोड़ा नहीं पैदा होता। आदमी से ऊँट नहीं पैदा होता। जैसा पिता होता है वैसा ही पुत्र होता है। डार्विन का सिद्धान्त तो खण्डित हो गया कब का। जो कहता था कि बन्दर से मनुष्य बने हैं। उत्तर दिया वेद ने -
यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति।
यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥
                   (मुण्डको. १-१-७)

अरे ! तुमको आश्चर्य हो रहा है? अच्छा, एक बात बताओ । तुम्हारा शरीर चेतन है? हाँ है। उससे जड़ क्यों पैदा हुआ? कहाँ? ये बाल। बाल को काट दो, दर्द हुआ? नहीं। क्यों, ये बाल क्या चिपकाये गये हैं बाहर से? चेतन से निकले हैं। हाँ। और जड़ हैं? हाँ। अरे! नाखून चेतन से निकला? हाँ। और आप हर हफ्ते काटते रहते हैं' हँसते हुये। यानी दो प्रकार के नाखून- एक जड़, एक चेतन। अगर चेतन कट गया तो ' हू हू ' करते हैं। एक ही नाखून में दो विरोधी बात। फिर आप ही के शरीर में ये आश्चर्य की बात है। और वो तो -

आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि। (ब्र. सू. २-१-२८)

भगवान् के पास अनन्त विचित्र उलटी पुलटी दोनों प्रकार की शक्तियाँ हैं। योगमाया भी, माया भी। माया जड़ है, योगमाया चेतन है। वसुदेव ने भगवान् की स्तुति की -

त्वत्तोऽस्य जन्मस्थिति संयमान् विभोवदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात्।
त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः॥
                     (भाग. १०-३-१९)

हे श्रीकृष्ण! तुम्हारे कोई इच्छा नहीं है। गधा भी जानता है। इच्छा तो उसको होती है जो अपूर्ण हो, कुछ पाना बाकी हो। अज्ञानी हो, ज्ञान पाना है; दुःखी हो, आनन्द पाना है। कुछ पाना है। और जो सदा-
आत्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः।
                     (छान्दो. ७-२५-२)

जो ऐसा भगवान् है उसके इच्छा क्या होगी, क्यों होगी, लेकिन आप कर्म करते हैं। बिना इच्छा के कर्म कैसे होगा जी? हम लोग कोई कर्म करते हैं तो पहले इच्छा होती है। हाँ, वहाँ चलना चाहिये। अब चलेंगे। पहले इच्छा होगी। फिर क्रिया होगी।

स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ।
                       (वृहदा. ४-४-५)

तो पहले तो इच्छा ही होगी-

ज्ञानजन्या भवेदिच्छा हीच्छाजन्या भवेत्कृतिः।
कृतिजन्या भवेच्चेष्टा चेष्टाजन्या क्रियोच्यते ॥

कृति कैसे हो जायेगी बिना इच्छा के। लेकिन आप तो बड़ा कर्म करते हैं। अरे! सबसे बड़ा कर्म यही, सृष्टि-

जन्मस्थिति संयमान्।
                     (भाग. १०-३-१९)

फिर उसमें व्याप्त होना, फिर सारे संसार का नियामन करना, फिर सब जीवों के हृदय में अलग- अलग रूप से बैठना, फिर उसके अनन्त जन्मों के कर्मों का बहीखाता लेकर बैठना, उसको कर्मफल देना, उसके इन्द्रिय मन बुद्धि में तत्तत् कर्म करने की शक्ति देना। अरे ! कितने कर्म करते हैं । फिर अवतार लेना, किसी को बाप, माँ, बीबी बनाना और बेटा बनाना। सोलह हजार एक सौ आठ श्रीमती, एक एक श्रीमती के दस - दस बच्चे इतनी बड़ी फैमिली फिर सबको मरवा देना। बिना बात। और इच्छा नहीं है। और *'अगुणाद्'* ये सात्त्विक, राजस, तामस ये गुण भी नहीं हैं आप में। जब गुण नहीं हैं तो गुण के काम कैसे करते हैं? ये बच्चा पैदा होता है बिना गुण के? ये तो तीन गुण का काम है। अरे! ये गुस्सा भगवान् का, रथ का पहिया लेकर दौड़े मारने भीष्मपितामह को। आँख निकाल कर, भौंह तानकर, दाँत पीस के। ये गुस्सा कैसे आ गया? भगवान् को भी गुस्सा! ये गुण के काम हैं सब। ये राम ने इतने राक्षसों को मारा; श्रीकृष्ण ने अघासुर, बकासुर , खोपड़ासुर कितनो को मारा। हाँ, हाँ समझ गये। क्या समझ गये?

त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते
                      (भाग.१०-३-१९)

आप में अनेक विरोधी शक्तियाँ हैं। इसलिये आप सब प्रकार का कार्य कर लेते हैं।

न तेऽभवस्येश भवस्य कारणम्।
                     (भाग. १०-२-३९)

आप अभव हैं फिर भी जन्म लेते हैं। अनन्त जन्म, एक दो जन्म नहीं।

जन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेSङ्ग सहस्रशः।
न शक्यंतेSनु संख्यातुमनन्तत्वान्यापि हि।।
                    (भाग.१०.५१.३७)

अनन्त जन्म हो चुके हैं मेरे, मैं भी नहीं बता सकता उनकी संख्या। अरे ! जन्म तो कर्म से होता है । बिना कर्म के जन्म कैसे हो सकता है? पुण्य करोगे तो जन्म होगा, पाप करोगे तो जन्म होगा। जब कोई कर्म ही नहीं तो जन्म कैसे? लेकिन हो रहा है-

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
                           (गीता ४-५)

कालात्मा, केवल एक भगवान् निर्भय है। काल के भी काल। बाकी सब काल के अण्डर में हैं। लेकिन वो जरासन्ध के भय से ऐसे भागे ऐसे भागे कि इण्डिया क्रॉस कर गये। समुद्र में जाकर एक द्वीप में अपना निवास बनाया। द्वारिका बसाया। और भक्तों ने नाम धर दिया रणछोर। हमारे श्यामसुन्दर रणछोर हैं। ये भी कोई तारीफ है! लड़ाई के मैदान को छोड़ कर भागने वाले। अरे ! ये तो बुराई है। अरे! ये ही तो लीला है। कालात्मा होकर भागना। आत्माराम होकर के इतनी स्त्रियों से प्यार करना। तो भगवान् के पास अनन्त शक्तियाँ हैं। इसलिये वो' 'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थः' है। जो चाहें सो करें, जो चाहें न करें, जो चाहें उल्टा करें।

अंगानि यस्य सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति पश्यन्ति पान्ति कलयन्ति चिरं जगन्ति । आनन्दचिन्मय सदुज्वलविग्रहस्य गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि।
                  (ब्रह्म संहिता ५-३२)

उनके एक अंग से सब इन्द्रियों का वर्क हो जाता है। क्या मतलब? एक नाक है, नाक का काम क्या? सूंघना। नाक सुन सकती है? नहीं। देख सकती है? नहीं। केवल सूंघने का काम करती है। कान केवल सुनने का काम करता है। मन केवल सोचने का काम करता है। लेकिन भगवान् के यहाँ ऐसा नहीं होता। एक नाक से वो देखते भी हैं, सुनते भी हैं, सूंघते भी हैं, रस लेते हैं, स्पर्श करते हैं, सोचते हैं, डिसीजन लेते हैं, भागते हैं, पकड़ते हैं, सब कर लेते हैं। और बिना किसी इन्द्रिय के भी सब कर्म कर लेते हैं।

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स श्रृणोत्यकर्णः।
स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्रयं  पुरुषं महान्तम्।।
(श्वेता. ३-१९)

बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु कर्म करइ विधि नाना । आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु जिह्वा वक्ता बड़ जोगी । तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ घ्राण बिनु वास असेखा । असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाई नहिं बरनी ॥

अलौकिक माने जो हमारी बुद्धि में न आवे क्योंकि हम ऐसा नहीं कर सकते। बिना नाक के सूंघे, बिना रसना के बोलें और वो ऐसा करता है। तो भगवान् ने, जिसको सर्वकर्मा कहते हैं, सर्वसमर्थ कहते हैं, सर्वशक्तिमान् कहते हैं -

मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्व कामः सर्व गन्धः सर्वरस सर्वमिदमभ्यातोऽवाक्यनादरः।
                     (छान्दो. ३-१४-२)

वेद कहता है। वो तो सर्वशक्तिमान् और विपरीत विरोधी शक्तियों का अधिष्ठान है भगवान्। यदि ऐसा कार्य करता है यानी उससे जड़ जगत् पैदा हुआ और आनन्दहीन पैदा हुआ तो इसमें आश्चर्य क्या? और कोई कहे फिर ये क्यों कहा गया कि *'जगच्च यः'*  ये संसार भगवान् ही है ।

न चान्तर्न बहिर्यस्य न पूर्वं नापि चापरम्।
पूर्वापरं बहिश्चान्तर्जगतो यो जगच्च यः॥
                     (भाग. १०-९-१३)
 
वो जगत् स्वरूप है । विश्वरूप उसका नाम ही है। देखो, भगवान् के कितने विरोधी नाम- विश्वकृत माने संसार बनाने वाला, विश्ववित् इसमें सर्वव्यापक है इसलिये जानने वाला। विश्वकृत, विश्ववित् और विश्वरूप यानी जैसे भगवान् था वैसे ही भगवान् बन गया। कुछ बनाया नहीं । जो कुछ भगवान् था पहले, वही भगवान् प्रकट हो गया -

सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्ष मथोस्वः ॥
              (नारायणोपनिषद् ५-७) 
ससर्जेदं स पूर्ववत्। (भाग.२-९ -३८ ) 

प्रजाः सृज यथापूर्वं याश्च मय्यनुशेरते।
                      (भाग. ३-९-४३)

यानी, जैसे संसार था प्रलय के पहले और भगवान् में सब लीन हो गया था; वैसे ही फिर प्रकट हो गया।

तो भगवान् के अन्दर ये संसार था। और संसार माने क्या? तीन का मिक्श्चर- एक भगवान्, एक जीव, एक माया। बस इसी का नाम भगवान।

अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥
                          (श्वेता.४-९)

इस संसार में आप क्या देखते हैं? एक तो जड़ वस्तु है, ये माया और एक चेतन हम लोग और महा चेतन भगवान् सर्वव्यापक। ये तीन का मिक्श्चर संसार है। इसी संसार में हम लोग जड़ देखते हैं। इसी संसार में ज्ञानी लोग ब्रह्म को देखते हैं। इसी संसार में भक्त लोग भगवान् को देखते हैं। संसार एक है।

उमा जे राम चरण रत विगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं विरोध।।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।
                        (गीता ७-१९)

अतएव भगवान् सर्वव्यापक है तो ये संसार भी वैसे ही है। एक शब्द का अन्तर है। ध्यान दो। श्रीकृष्ण निरावरण ब्रह्म हैं। और संसार सावरण ब्रह्म है। बस। तो निरावरण ब्रह्म से चाहे जानकर प्यार करें, चाहे अनजाने में करें, भगवत्प्राप्ति होगी और सावरण ब्रह्म में बिना जाने भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। जरा बुद्धि लगाओ। भगवान् को भगवान् जानकर कोई प्यार करे भगवत्प्राप्ति हो जायेगी? हाँ वो तो हो ही जायेगी। और अगर भगवान् को भगवान् नहीं जानता इन्सान जानता है- अपना बाप मान लिया, अपना बेटा मान लिया, पति मान लिया वो भी भगवत्प्राप्ति करेगा। क्यों? इसलिये कि किसी ने किसी को जहर पिला दिया तो वो मर गया। किसी ने आत्महत्या करने के लिये अपने आप पी लिया वो भी मर गया। यानी जहर अपना काम करेगा। चाहे जान कर पियो, चाहे अनजाने में पिओ। चाहे कोई स्त्री सती होने जाय वो भी जलेगी। किसी को आग में पटक दो वो भी जलेगी। यानी वस्तु का फल मिलता है भावना से कोई मतलब नहीं। इसीलिये भागवत में कहा गया -

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥
                  (भाग. १०-२९ -१५)
भगवान् के प्रति कैसे ही प्यार हो जाय मन का भगवत्प्राप्ति का फल मिलेगा। कंस को भी मिला, शिशुपाल को भी मिला, गोपियों को भी मिला। लेकिन संसार में क्या है? देखो संसार में भगवान् की भावना करके प्यार करने वाले भी तर गये। संसार में भगवान् की भावना। ये मूर्ति क्या है? पत्थर की मूर्ति, मिट्टी की मूर्ति, सोने की मूर्ति, लोहे की मूर्ति। मूर्तियाँ होती है न आठ प्रकार की। अरे, मन की भी मूर्ति होती है।

मनोमयी मणिमयी प्रतिमाष्ट विधास्मृता ।
                  (भाग. ११-२७-१२)

ये मूर्ति तो जड़ है न। हाँ, पत्थर की बनी है। चट्टान को तोड़ा वोड़ा, हथौड़ी चला कर नाक मुँह बना दिया। हाँ। लेकिन अगर उसमें आपने भगवान् की भावना कर ली तो भगवत्प्राप्ति का फल होगा। अनन्त जीव भगवत्प्राप्ति कर लिये मूर्ति के द्वारा या मन से ही बना लो। वो भी मायिक है। ये भी गया भगवान् के पास। और जिसने ये संसार में संसार की भावना की बस वो मर गया। वही हम लोग कर रहे हैं। हम लोग जो प्यार कर रहे हैं मायाबद्ध या मायिक वस्तु से; ये संसार में संसार की भावना वाला प्यार है।

 एक पत्थर की मूर्ति बनाओ अपने बाप की, अपनी माँ की , अपने बेटे की। हाँ बनाया। अब उसमें भावना बनाओ बाप की, माँ की, बेटे की। हाँ बनाया। तो क्या मिलेगा? जीरो बटे सौ। क्यों, भगवान् का फल तो मिल जाता है मूर्ति से। भगवान् का फल इसलिये मिल जाता है नम्बर एक, भगवान् सर्वव्यापक है, वो पत्थर में भी व्याप्त है। आपका बाप पत्थर में व्याप्त नहीं है वो तो इंग्लैण्ड में बैठा है। नम्बर दो , भगवान् सर्वज्ञ है वो आपके हृदय की भावना को जानता है। इसलिये वो भगवान् का फल दे देता है। आपका बाप क्या जाने। आप रो- रोकर मर गये उसको पता ही नहीं है। आपको जला भी दिया गया उसको पता ही नहीं है। जब कोई चिट्ठी जाय, तार जाय, फोन जाय- ऐऽ! मेरा बेटा मर गया!

इसलिये संसार में संसार की भावना करने वाले को चौरासी लाख में घूमना पड़ता है और बाकी तीन, कृतार्थ हो गये।

 तो भगवान् के अवतार काल में दो बातें होती हैं- भगवान् जानकर के भी लोगों ने उस समय प्यार किया, महापुरुषों ने और बिना जाने अपना बाप मान लिया, बेटा मान लिया और पति मान लिया और प्यार हो गया मन का बस, वो भी गया। अब अवतार नहीं है तो ? तो फिर हम जड़ वस्तु में भगवान् की भावना करके भगवत्प्राप्ति करते हैं अथवा बिना वस्तु के। मन भी तो जड़ है इससे चिन्तन बना करके भगवत्प्राप्ति कर लेते हैं। जब अघासुर का भगवान् में प्रवेश होने की बात शुकदेव परमहंस ने कही तो परीक्षित का माथा ठनका। उसने कहा गुरु जी ! इतना बड़ा पापी अघासुर, सारे ग्वालों को अपने अन्दर कर लिया उसने कि सब को खा जाय। मुँह बन्द कर सब मर जायें। तो भगवान् ने कहा- "अरे रे! ये क्या कर रहा है? हमारे सारे सखाओं को खा जा रहा है।" तो भगवान् भी घुस गये उसके मुँह में। उसने कहा- "बड़ा अच्छा हुआ, आओ - आओ तुम भी आ गये। अब आज तो छुट्टी मिली पूरे परिवार की। हम तो यह ही चाहते थे कि वो नेता भी आ जाय। "तो भगवान् ने कहा- अच्छा बच्चू मैं बताता हूँ। तो भगवान् बड़े होते गये। होते - होते , होते - होते उसका मुँह फट गया और वो मर गया। वो भगवान् में लीन हो गया। तो परीक्षित ने कहा , अरे ! उसको नरक मिलना चाहिये ! तो शुकदेव परमहंस ने कहा-

सकृद् यदङ्ग प्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।
                   (भाग. १०-१२-३९)

अरे गधे ! जब मन से बनाई हुई मूर्ति की उपासना, भगवद् भावना करने से भगवत्प्राप्ति किया या अनन्त महापुरुष बने; तो वो तो साक्षात् भगवान् उसके मुँह में घुस गये थे। फिर भी वो न तरे!

 तो इसलिये संसार में संसार की भावना करने वाला नहीं तरेगा। उसको संसार ही मिलेगा। इसलिये भगवान् ने अर्जुन से कहा-

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
                        (गीता ८-७ )

अर्जुन ! निरन्तर मेरा स्मरण कर। ताकि अन्त समय में मेरा स्मरण हो। अंत समय में अगर मेरा स्मरण होगा तो मेरा लोक प्राप्त होगा -

मद्भक्ता यान्ति मामपि।
                           (गीता ७-२३)

 एतावान् सांख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।
जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः॥
                         (भाग. २-१-६)

कर्म , धर्म , ज्ञान , योग किसी भी साइड से ; किसी भी मार्ग से जाओ निरन्तर चिन्तन करो कि अन्तिम समय में भगवान् का स्मरण हो। तब भगवत्प्राप्ति होगी। इसलिये भगवान् के विषय में-

तर्काप्रतिष्ठानात्।
                        (ब्र.सू. २-१-११

वेदान्त सूत्र कहता है कि वहाँ तर्क मत ले जाओ। ये तर्क वाली तुम्हारी मायिक बुद्धि है। अरे जब इण्डिया का कानून इंग्लैण्ड में लागू नहीं होता तो फिर तुम्हारा ये मायिक तर्क भगवान् के एरिया में कैसे लागू होगा? वहाँ न ले जाना बुद्धि को। वो बुद्धि से परे है। ये भावार्थ है।

            जगद्गुरुत्तम श्री कृपालु जी महाराज
भगवान् ने ये दुःखमय संसार क्यों बनाया ? भगवान् ने ये दुःखमय संसार क्यों बनाया ? Reviewed by Admin on February 18, 2023 Rating: 5

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